स्वीकार कर लेने का अवसर जीवन में कई बार आता है। क्या तुमने कभी गौर किया है तुम जीवन में कितनी बार परिस्थिति, व्यक्ति या वस्तु में दोष देखते हो? दोष देखना गलत नहीं है, जब दोष देखते हो तभी तो उसका निवारण कर सकते हो। पर सिर्फ़ दोष ही देखते रहना, अगर यह आत्मा में गहरा बैठ जाए तो धीरे धीरे तुम्हे पता भी नहीं चलता तुम स्वयं वो दोष बन जाते हो। फ़िर तुम वैसी ही परिस्थिति अपने आसपास आमंत्रित करते हो और तुम्हारे संकल्प की शक्ति कम हो जाती है।
एक प्रयोग करके देखो - तुम अपने किसी दोस्त या घर के सदस्य से पूछो कि कितनी बार तुम दोष देखते हो या कहते हो यह ठीक नहीं है, या वो ठीक नहीं है। तुम खुद हैरान हो जाओगे! तुम हर साल अपनी मानसिकता में विकास देख सकते हो। मन के प्रति सजगता की आवश्यकता है।